समकालीन कविता में समतामूलक परिदृश्य


मानवीय जीवन व सभ्यता के प्रारंभिक दौर में ही समाज को परिचालित और नियंत्रित करने के लिए, नियमों और कानूनों की जरुरत के अहसास ने एक व्यवस्था को जन्म दिया । जिसमें लचीलापन, सहजता तथा परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन की क्षमता मौजूद थी । समय के साथ ही साथ इसकी लचक ख़त्म होती दिख रही है तथा अपने अस्तित्व की सुरक्षा और वर्गीय स्वार्थों की पूर्ति के गरज से शासक वर्ग रेशम के कीड़े की भांति अपने चारों ओर अपनी निरंतरता ,तार्किकता ,सार्वभौमिकता और शाश्वतता का तर्क जाल बुनना जरुरी हो गया । व्यवस्था या शासक वर्ग का यह तर्कजाल आम आदमी की मानसिकता पर हावी होने की कोशिश करता है । ऐसी स्थिति में आमजन या तो यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है या फिर उससे मुठभेड़ करने की कोशिश करता है । समकालीन कविता ऐसी किसी भी स्थिति के बरक्स अपने आप को सत्यापित करती है । जैसा कि नई कविता के कवि पर मनुष्य का दर्द ,पीड़ा,यातना, टूटन और त्रासद की स्थिति का अहसास हावी है, किन्तु मुक्तिबोध सरीखे कवि को छोड़कर अन्य कवि के यहाँ यह व्यथा मुख्यत: आतंरिक और निजी है । मुक्तिबोध के यहाँ आम मनुष्य की चिंता केंद्र में है । मनुष्य किस तरह दो शक्तियों के बीच पिस रहा है उसकी पड़ताल मुक्तिबोध की कविता करती है –“पिस गया वह भीतरी /औ बाहरी दो कठिन पाटों के बीच /ऐसी ट्रेजिडी है नीच ।’’[1]
समानता के परिप्रेक्ष में बात की जाय, तो वह विचारों की एक ऐसी संगति है जिसके अंतर्गत ऐसे क्षेत्र आते हैं जो मानव के अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए प्रयास से शुरू होकर सामाजिक अन्वेषण तक अपनी महती भूमिका निभाते हैं, जिसमें सबल और कमजोर दोनों ही न केवल साथ रहते हैं अपितु दोनों को समान सुनवाई के अधिकार भी प्राप्त होते हैं । निहितार्थ यह कि कुछ मूल विशेषताओं या गुणों के लिहाज से जो सब में समान है जैसे मानव स्वभाव, मानव का महत्व और गरिमा, मानव व्यक्तित्व आदि में सभी व्यक्तियों को समान समझा जाना चाहिए । समानता के सन्दर्भ में आधुनिक आदर्शवाद के पिता कहे जानें वाले इमैनुअल कान्ट की उक्ति यहाँ प्रासंगिक है –“चाहे अपनी या किसी और व्यक्ति की दृष्टि में,मानवता को मात्र साधन नहीं बल्कि हर स्थिति में साध्य समझो ।”[2]
समकालीन कविता के निशाने पर वह व्यवस्था है जो समाज में समता समानता व बंधुत्व के मार्ग में बाधक है । जो अपने वर्गीय स्वार्थों के तहत वास्तविकता की शिनाख्त को हमेशा के लिए खत्म करने की फिराक में है । समकालीन कविता बड़े ही मुस्तैद तरीके से समय और समाज के मूल्याङ्कन पर बल देती है, उसे वह सब नापसंद है जिससे समाज की प्रगति अवरुद्ध होती हो । सामंती पूंजीवादी और साम्राज्यवादी नीतियों पर अपना विरोध दर्ज कराती है, यदि वह समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व न करती हो । समाज की प्रगति के मारिफत वह अपने मंतव्यों की परिणति तय करती है । समकालीन कविता समाज के उस वर्ग का नेतृत्व करती है जो हाशिये पर है जिसे प्रताड़ित किया गया है । जिसकी पक्षधरता समाज के वौद्धिक वर्ग का दायित्व है । समकालीन कविता की संघर्ष चेतना ही उसमें आशा, आस्था और विश्वास पैदा करती है । वह इंसानी जिंदगी को बेहाल कर देने वाली समस्याओं ,मानवीय व्यक्तित्व को कुंद कर देने वाली शक्तियों और मनुष्य की दु:प्रवित्तियों  की शिनाख्त करती हुई उससे बाहर निकालने के मार्ग को खोजती भी है । समकालीन कविता सामाजिक व्यवस्था के उन कारकों को प्रश्नांकित करती है जिसके कारण आमजन को दो जून की रोटी भी नहीं नशीब हो पा रही है । आमजन रोटी के आलावा कुछ सोच भी नहीं पा रहा है, साक्ष्य के तौर पर रोटी ही मनुष्य का सबसे बड़ा तर्क हो जाता है । अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति वह सोच भी नहीं सकता चूँकि ‘भुभुक्षिता किम न करोति पापं’ की उक्ति यहाँ चरितार्थ हो रही है  ।धूमिल की चिंता यहाँ जायज ठहरती है –‘‘ भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है  ।’’[3]
समकालीन कविताएं मानवीय चिंता की कविताएं हैं, जिनमें समकालीन जिंदगी के दबावों को सहते हुए और आज के यांत्रिक और साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज के विसंगति और तनावों में निरंतर टूटते हुए मनुष्य की यंत्रणा और त्रासदपूर्ण स्थिति के साथ ही साथ उसकी संघर्षशील चेतना शक्ति भी व्यक्त हुयी है । आज के समय में कथनी और करनी में कितना पार्थक्य हो गया है, चंद्रकांत देवताले की कविता उस पर सवाल करती हुई मानवीय मानसिकता को उदघाटित करती है –“आकड़ों और सरकारी वक्तव्यों से /सट जाने पर /एक झूठे कुहासे के बीच /आइना गायब कर देना /वकालत है या खिलाफत /जानना जरुरी है /खासकर ऐसे समय में /जब कविता सीढ़ी नहीं है /और हमें आदमी से दूर /कहीं नहीं जाना हैं .... ।’’[4]
भारतीय संविधान में वर्णित प्रावधानों का पालन कहाँ तक हो पा रहा है वह जग-जाहिर है । समकालीन कविता आज की रचनाशीलता में हुए संवेदनात्मक ह्रास को दिखलाती है । समता समानता की बात करने वाला राजनीतिक रूप से सबल शोषक वर्ग के चारित्रिक पतन को उदघाटित करते हुए उसकी भयावहता का नंगा नाच भी दिखलाती है । व्यक्ति स्वातंत्र्य की पक्षधरता करने वाला शासक वर्ग जब जनता की मुक्ति का प्रश्न आता है तब वह मौन हो जाता है । यह कैसी मुक्ति और कैसी नैतिकता है? समकालीन कविता उन समस्त संविधानिक प्रावधानों को जनता पर लागू करने की बात करती है, तथा विवेचन एवं मूल्याङ्कन पर भी ध्यानाकर्षण करने पर बल देती है । समकालीन कविता जहाँ एक ओर शोषित जनों की विडंवनापूर्ण स्थिति का चित्रण करती है वहीं दूसरी ओर शोषक वर्ग के प्रतिनिधियों का भी कच्चा चिट्ठा खोलती है । “निर्धन जनता का शोषण है/कहकर आप हँसे/लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/ कहकर आप हँसे /सब के सब हैं भ्रष्टाचारी कहकर आप हँसे/चारों ओर बड़ी लाचारी कहकर आप हँसे/कितने आप सुरक्षित होंगे/मैं सोचने लगा/सहसा मुझे अकेला पाकर/फिर से आप हँसे  ।”[5]
दरअसल समकालीन कविता वर्तमान समय और समाज में हो रहे अत्याचार, हमलों एवं हत्या का ही जिक्र नहीं करती अपितु अत्याचारियों को समाज के समक्ष यथास्थिति के रूप में लेने पर बल देती है । आज हम कितने कठिन दौर से गुजर रहें है इसका अंदाजा साहित्यकारों को मिल रही धमकियों एवं उनकी असामयिक मृत्यु से लगाया जा सकता है । जब लेखक जीवित होते हुए भी अपने लेखकीय मृत्यु की घोषणा करता हो तब हमें अपने समय के भयावहता की स्थिति का अनुमान लगा लेना चाहिए । जहाँ तक वैयक्तिक रूप से मैं सोचता हूँ तो पाता हूँ कि भारत में घट रहे वर्तमान आत्यंतिक अत्याचारों के पीछे शोषक वर्ग, सामंतवर्ग और पूंजीवर्ग का मिलाजुला संस्करण ही जान पड़ता है । अव्वल यह कि भारतीय पूंजीवाद जिसे हम अपना हिमायती समझते हैं उसने सामंतवाद से गठजोड़ कर रखा है, किसी न किसी तरीके से अपने को शक्तिशाली बनाए रखना चाहता है । किन्तु यह कितना संभव होगा इसका उत्तर इतिहास से लिया जा सकता है । एक न एक दिन उसकी मजबूत ईमारत रेत की ढूह की तरह ढह जाएगी । यह जानते हुए वह अपने आखरी चरण में रक्षात्मक लड़ाई लड़ रहा है । स्वतंत्रता, समता, समानता तथा बन्धुत्व के अपने पुराने नारे के साथ अब भी वह जनतंत्र का ढोंग रच रहा है, उसकी दुहाई दे रहा है । किन्तु जब भी जनता एक बड़े स्तर पर अपने अधिकारों के निमित्त जागरूक होकर मांग करती है, तब यह शोषक एवं बुर्जुआ वर्ग अपना नकली मुखौटा उतारकर फासीवादी प्रवृतियों के साथ जनता के अधिकारों का दमन करने के लिए प्रस्तुत हो जाता है । समकालीन कविता जनता की पक्षधरता को अपना मुख्य ध्येय मानती है ।“यदि तुम रंगों का यह हमला/रोक सको तो रोको वरना/मत आंको तस्वीरें/कम से कम विरोध में/और अगर चेहरे गढ़ने हों तो/अत्याचारी के चेहरे खोजो/अत्याचार के नहीं/इसको हम जानते बहुत हैं/वह अब भी छिपता फिरता है ।”[6]
हिंदी कविता के कई आन्दोलनों में नई कविता प्रमुख है, किन्तु उसके पश्चात् कविता में विद्रोह,अस्वीकार तथा वर्तमान को सजग होकर देखने की प्रवृत्ति समकालीन कविता में अधिक मिलती है । समकालीन कविता ने समाज को राजनीतिक अर्थमयता एवं मानवीय तात्कालिकता प्रदान की । समकालीन कविता गहरे एवं व्यापक स्तर पर समय के हस्तक्षेप की कविता है, जो समाज को बदलने तथा जागृत करने का माद्दा रखती है । प्रत्येक अन्याय के खिलाफ पुरजोर बगावत करती हुई जीवनधर्मिता के अपने गुण का निर्वहन भी करती है । जड़ता,अनास्था,हताशा,अत्याचार के विरुद्ध निराशा में भी आशा के सामर्थ्य की खोज करती है । समकालीन कविता में भावना के साथ-साथ विचार की प्रमुखता है । समाज के कल्याणार्थ विचार के स्तर पर जो मुहिम उठाई गई है, उसमें भी समवेत मुक्ति की कामना ही अन्तर्निहित है ।“जितना बचा हूँ/उससे भी बचाए रख सकता हूँ यह अभिमान/कि अगर नाक हूँ/तो वहां तक हूँ जहाँ तक हवा/मिटटी की महक को/हलकोरकर बांधती/फूलों की सूक्तियों में/और फिर खोल देती/सुगंधी के न जाने कितने अर्थों को/हजारों मुक्तिओं में ।”[7]
समकालीन कविता जीवनानुभव और काव्यानुभव को एक साथ लेकर अपनी समीक्षा दृष्टि का परिचय देती है । दोनों समन्वित रूप में एकाकार हुए दीखते हैं । दोनों की  समता उनके अंतर्संबंधों की बुनावट से जांची जा सकती है । समकालीन कवि अपनी बात को कहने के लिए सपाटबयानी एवं  बिम्बधर्मी प्रतीकों का सहारा लेता है, चूँकि उसका मुख्य ध्येय अपनी बात को सही तरीके से कहना और जिस मकसद से वह अपनी बात कहना चाहता है, उस तक अपने विचार को पहुँचाना अपना मुख्य दायित्व समझता है । क्योंकि समकालीन कवि अपने भोगे हुए और सहे गए सत्य की ही चर्चा करता है । इसलिए उसकी वाणी में संकल्पधर्मी चेतना का उदगार होता है । समकालीन कविता समय के खतरों से बचकर दूसरा रास्ता नहीं बदलती बल्कि ईमानदारी और सचाई से उसका सामना करती है, जिससे आने वाले भविष्य से आँखों में आंखे  डालकर उसका सामना कर सके न कि आँख छुपाकर शर्मिंदा हो । जीवन्तता और आत्मान्वेषण, विचार और संवेदना, अर्थगहनता और शब्दयोजना की दक्षता आदि तत्त्व समकालीन कविता को उसकी गतिमयता से जोड़ते हैं । मनुष्य और मनुष्य के बीच बढ़ रही दूरी को समकालीन कविता रेखांकित ही नहीं करती अपितु उन कारणों की पड़ताल व उसके समाधान हेतु उपादान भी प्रस्तुत करती है । समकालीन कवि देश की शासन व्यवस्था, अफसरशाही, नेतावर्ग, संसद के सभी सदस्य, समाजवाद का रूप जनतंत्रवाद आदि सभी की असलियत दिखाने का प्रयास किया है । जैसा कि धूमिल जनतंत्र के असल रूप का परिचय देते हैं –“शहर की समूची पशुता के खिलाफ गलियों में नंगी घूमती हुई/पागल औरत के गाभिन पेट की तरह/सड़क के पिछले हिस्से में छाया रहेगा अन्धकार/.....और तुम महसूसते रहोगे कि जरूरतों के/हर मोर्चे पर/तुम्हारा शक/एक को नींद और दूसरे को नफरत से/लड़ा रहे  हैं  ।”[8]
समकालीन समय में सत्ता के चरित्र को इस तरह भी देखा जा सकता है कि वह राष्ट्रवाद, समाजवाद, स्वतंत्रता, समता, समानता आदि मुहावरों के नाम पर भयानक नरसंहार, युद्ध, अत्याचार, दमन, शोषण आदि में संलिप्त है, जो प्रत्यक्षतः देखा जा सकता है । कविता समय की बहुकेंद्रियता को अपना आधार बनाती है, वह सत्ता की तानाशाहपूर्ण नीति के विरुद्ध जनतंत्र का समर्थन करती है । शासकवर्ग चाहता है कि कवि या साहित्यकार भी उसी की भाषा बोले,पर यदि वह उसकी भाषा में नहीं बोलना चाहता तो चुप रहे । किन्तु साहित्य आत्मा के विस्तार का दूसरा नाम है । इसलिए वह सीमाओं में बंधकर नहीं रहता बल्कि उसका अतिक्रमण करता है । समकालीन साहित्य सत्य कहकर अपना औचित्य सिद्ध करता है । जैसा कि मोरिस ब्लैंशों ने कहा है-“अगर तुम अपने समय को सुनोगे तो पाओगे कि वे चाहते हैं कि तुम उनके नाम पर बोलो नहीं बल्कि उनके नाम पर चुप रहो ।”[9]
पूंजीवादी व्यवस्था श्रमिक जनता का आर्थिक रूप से शोषण ही नहीं करती,उसके सौंदर्य प्रतिमान तथा जीवन बोध को भी गहरे स्तरों पर प्रभावित करती है । पूंजीपतियों के लिए प्रकृति का सारा सौंदर्य है किन्तु सर्वहारा व किसान के लिए मात्र गन्दीबस्तियों में ही जीवन अपरिहार्य है । समकालीन कविता उन वजहों की फ़िराक में है जिसके कारण किसान अभिशप्त है मलीन और दुःखपूर्ण जीवन जीने के लिए, मजदूर परेशान है अपनी उचित मानदेय के लिए । आखिर उन सबका क्या दोष है जो उनकी उचित भागीदारी से उन्हें रोकता है । समकालीन कविता उनकी भागीदारिता के लिए उन समस्त ताकतों को  चुनौती देती है कि यदि वे उन्हें उनका हिस्सा व उनकी समय सापेक्ष महत्वपूर्ण उपयोगिता सुनिश्चित नहीं किये तो वे स्वयं ही अपना अधिकार छीन लेंगे । क्योंकि किसी भी समुदाय वर्ग को अधिक दिनों तक परतंत्र नहीं रखा जा सकता है । पराधीन बिखरी हुई शक्तियां जब एकजुट होती हैं तो शासक वर्ग के अस्तित्व को हिलाकर रख देती हैं । समकालीन कविता गुलाम जनता की मनोवृति, उनके संघर्षों, आशाओं आकांक्षाओं की बेहद साफ़ तस्वीर पेश करती है, उनके जन संघर्षों की गति को बढ़ाती है,तथा साम्राज्यवादी शक्तिओं को बेनक़ाब भी करती है । समकालीन कविता में आदिवासी जीवन का चित्रण करने में सरकार द्वारा निर्धारित किये गए मानकों का प्रतिकार किया गया है । चूँकि विकास के मानक आदिवासियों के सापेक्ष न होकर उनके परोक्ष हैं । कवि ज्ञानेंद्रपति कहते हैं –“इस आदिवासी गॉव के आंगन से गुजरती हुई यह सड़क/अत्याचारिओं के गुजरने का रास्ता है /यह इनके पैरों से नहीं बना /बड़े बड़े रोड रोलर आये थे लुटेरे वाहनों के आने से पहले /धरती कंपाते धीरे धीरे चलते हुए विशालकाय रोड रोलर ..... ।”[10] 
समकालीन कविता का मनुष्य की यथार्थता से गहरा सम्बन्ध है । इसलिए वह मनुष्य की वास्तविक स्थिति का बखान करने से नहीं चूकती बल्कि अपने उत्तरदायित्व को भलीभांति निभाती है । शहर और गॉव दोनों के संकट झेल रहे मनुष्य की वेदना,निराशा,और टूटन को व्यक्त किया है । समकालीन कविता का मनुष्य पूर्ववर्ती धारणाओं चिंतकों को ही नहीं अपितु समकालीन विचारकों के निष्कर्षों और समाधानों को भी प्रयोग की कसौटी पर तोलता है । किसी पूर्वधारणा से प्रभावित हुए बगैर सत्य की जाँच करता है । समकालीन समय विचार प्रधान है न की भावना । अब सवाल तर्क और उसकी निर्मिति से सुलझाए जाते हैं न कि भावना से । “समकालीन कविता का वैचारिक तेवर,रचनाकर की मानसिकता और उसके काव्यानुभव के बदलाव की वजह से उभरा है क्योंकि आज के काव्यानुभव से भावना का उतना योग नहीं रहा जितना कि विचार का और कवि की संवेदनात्मक प्रकृति में भाव विह्वलता की जगह वैचारिक बेचैनी ने ले ली है ।”[11]
बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में सभ्यता का जो परिवर्तन देखने को मिलता है, उसके चलते मानवीय संबंधों व संवेदनाओं के क्षरण की गतिकी में भी तीव्रता अनुभव की गयी । सोवियत संघ का टूटना, शीतयुद्ध की समाप्ति और एक ध्रुवीय संसार के नवअधिनायकवाद की स्थापना, उदारीकरण और निजीकरण के ए माडल को अपनाने की विवशता पूंजी और संस्कृति का वैश्वीकरण, तकनीकी और संचार के क्षेत्र में क्रांति, अर्थव्यवस्था के एकीकरण और विश्वबाजार की विवशता आदि अनेक प्रक्रियाएं इसी समय आयीं, तथा समूची दुनिया के बुनियादी सामाजिक ढांचे को प्रभावित की । समकालीन कविता में राजनीतिक हस्तक्षेप बराबर अपनी उपस्थिति के साथ दर्ज होता है । उसे महसूसते हुए उसकी निष्पत्ति तक ध्यान की प्रक्रिया को खगाला जाता है । साहित्य और राजनीति का रिश्ता तनाव का होता है । जब-जब राजनीति अपना रास्ता भटकती है तो साहित्य उसका मार्गदर्शन करता है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रन्थ में लिखा है-“साहित्य को राजनीति के ऊपर रहना चाहिए, सदा उसके इशारों पर ही न नाचना चाहिए ।”[12]  
अव्वल यह कि समकालीन कविता में समता भी एक महत्त्पूर्ण विषय है, जो स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों की संकल्पना का सहवर्ती समझा जाता है । क़ानूनी रूप से समकालीन साहित्य सभी को समान और स्वतंत्र देखना चाहता है, शिक्षित देखना चाहता है, किसी भी प्रकार के भेद-भाव की भर्त्सना करता है । समकालीन समय इस बात की मांग करता है कि संसाधनों में विभेद नहीं होना चाहिए बल्कि सर्वसुलभता होनी चाहिए । जैसा कि कहा गया है –“अधिकारों के रूप में हमें जिन परिस्थितियों की प्रतिभूति हो जाती है,वे उतनी ही मात्रा में अन्यों के लिए भी प्रतिभूत हो जाएगी और अन्यों को जो अधिकार प्रदान किये जाते हैं,वे मुझे भी दिए जायेंगे ।”[13]
समकालीन कविता समय के उन सभी हलचलों को महसूस करती है जिससे सामाजिक संरचना प्रभावित होती है । वैविध्यपूर्ण जीवन दर्शन समकालीन कविता की एक प्रमुख विशेषता है । समकालीन कवि जीवन की बढती अनेक समस्याओं के प्रति गहरे सचेत हैं, साथ ही समाज सुधार उनके कवि कर्म का अभिन्न अंग है । सच ही कहा गया है कि किसी भी लेखक या कवि की सफलता इस बात पर निर्भर करती है, कि उसका अपने युग-जीवन से जुड़ाव कैसे, कहाँ, और किस स्तर का है । जैसा कि आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने कहा है-“जो कवि सामाजिक जीवन की जितनी ही महान हलचलों के बीच से गुजरेगा और साथ ही जितना ही अनुभवसंपन्न  होगा, उसकी साहित्यिक संभावनाएं उतनी ही विशाल होगी ।”[14]
कवि का जीवन वास्तव में सच्चे द्रष्टा का होता है । जो सामाजिक संरचना के समस्त अंग-उपांग की प्रसंग सम्यक व्याख्या करता है । किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर वास्तविक स्थिति की तलाश करता है । समकालीन कविता ने जीवन के उन तमाम बहसों को शामिल किया है जो अमूमन लघु समझे जाते हैं । जबकि लघुता एक जीवन-स्थिति है जिसे कोई भी व्यक्ति अपनाना नहीं चाहता । समकालीन कवि राजेश जोशी की एक कविता है ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ जिसमें समय की विसंगति को दिखाया गया है । किस प्रकार हमारा शासन तंत्र अव्यवस्थित एवं विकृत हो गया है । इस कविता में बाल मजदूरी के माध्यम से व्यवस्था पर चोट किया गया है । जो समय की सचाई को उद्घाटित करता है-“कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं/सुबह सुबह /बच्चे काम पर जा रहे हैं/हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह/भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना/लिखा जाना चाहिए इसे एक सवाल की तरह/काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे? ।”[15]
अव्वल यह कि क्या समकालीन कवि अपने इस दायित्व का निर्वहन कर रहा है । अगर नहीं,तो कारण क्या हो सकता है? क्या, सिर्फ बात कर देने मात्र से समकालीनता का बोध हो जाता है, या हम अपने आप को समकालीन कहलाने लायक समझने लगते हैं । भ्रम तो तब और भी बढ़ जाता है, जब हम सवाल उठाने में ही अपने दायित्व को पूरा समझते हैं । यहाँ आत्म-मंथन की महती आवश्यकता है । जब तक समाज के प्रत्येक नागरिक को अपने समस्त अधिकारों एवं कर्तव्यों का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक हम अपने कर्म से मुक्त नहीं हो सकते । समकालीन कविता का प्रतिपक्षधर्मी स्वर अधिक नुकीला एवं धारदार है । व्यवस्था में निहित अर्थहीनताओं का विरोध कविता में लगातार हुआ है । साथ ही ऊब को आकार देने की पहल पर विचार हुआ है । -“उदासलोगों! उठो और फैसला दो/उठो और जिसने कल तुम्हें कुचला था/उस घोड़े की नाल बना दो/उसकी मजबूत हठवादिता को/उसकी मजबूत दुर्भावनाओं को/सड़क पर मिला दो ।”[16]
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि समकालीन कविता प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की कविता है । जिसमें समाज के नेतृत्व की समस्त कार्य विधि अन्तर्निहित है । समता, समानता व बंधुत्व समकालीन कविता की मूल अंतर्वस्तु है । जो समाज के सभी जाति-वर्ग के नेतृत्व की मांग करता है । समान पक्षधरता समकालीन कविता का केन्द्रीय फलक है । सामाजिक जड़ता से समवेत मुक्ति की आकांक्षा व अपनी जड़ों को पहचानने की संकल्पना का भाव लिए हुए है । समकालीन कविता की अपनी जमीन बहुत ही उपजाऊ एवं विस्तृत है । जो समय और समाज को जीवन्त बनाती है । सदियों की प्रताड़नाओं एवं भ्रष्ट नीतियों के शिकार बने लोगों के साथ संवेदनात्मक लगाव तथा मनुष्यता की तलाश समकालीन कविता की प्रमुख विशेषता है । समकालीन कविता सृजनात्मकता के उहापोह से मुक्त मानवीय जीवन से गहरा सरोकार रखती है । जो एक स्वस्थ्य समाज निर्माण के लिए महत्वपूर्ण एवं आवश्यक तत्व है ।  





[1] गजानन माधव मुक्तिबोध –चाँद का मुह टेढ़ा है ,भारतीय ज्ञानपीठ ,नई दिल्ली ,पृष्ठ संख्या 17
[2] जगदीश चन्द्र जौहरी-समकालीन राजनीतिक सिद्धांत,स्टर्लिंग पब्लिशर्ज प्रा.लि.,पृष्ठ संख्या 374
[3] धूमिल –संसद से सड़क तक ,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 112
[4] चंद्रकांत देवताले –दीवारों पर खून से संभावनाप्रकाशन,हापुड़,पृष्ठ संख्या 17
[5] रघुवीर सहाय-हंसो हंसो जल्दी हंसो,नेशनल पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 16
[6] सुरेश शर्मा –रघुवीर सहाय का कवि-कर्म ,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 132
[7] परमानन्द श्रीवास्तव-शब्द और मनुष्य,राजकमल प्रकाशन,पृष्ठ संख्या 30
[8] चंद्रकांत वान्दिवडेकर- कविता की तलाश,विभूति प्रकाशन,दिल्ली,पृष्ठ संख्या 121
[9] अशोक वाजपेयी-(सं.)कविता का जनपद,राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,23
[10] पी.रवि (सं.)–समकालीन कविता के आयाम, लोकभारती प्रकाशन,नई दिल्ली ,पृष्ठ संख्या,98
[11] डॉ.यश गुलाटी –कविता और संघर्ष चेतना,इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन,दिल्ली,पृष्ठ संख्या,123
[12] डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी-समकालीन हन्दी साहित्य विविध परिदृश्य,राधाकृष्ण प्रकाशक,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या 235
[13] जगदीश चन्द्र जौहरी-समकालीन राजनीतिक सिद्धांत,स्टर्लिंग पब्लिशर्ज प्रा.लि.,पृष्ठ संख्या 369
[14] विश्वनाथ त्रिपाठी-हिंदी आलोचना,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,134
[15] राजेश जोशी-प्रतिनिधि कविताएँ,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 74-75
[16] ए.अरविंदाक्षन-समकालीन हिंदी कविता,राधाकृष्ण प्रकाशक,नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या101



धीरेन्द्र सिंह शोध अध्येता (हिंदी विभाग) डॉ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय  सागर (म .प्र.)- 470003, मो.नं. 09005939570, ईमेल- dhirendra.sam2012@gmail.com  

1 टिप्पणी:

  1. आजादी

    जब हम थे सोए
    तब कोई ख़्वाब था आया
    किसी अपने ने ही
    खून था बहाया,,,,,,

    लेकर निशानी हम भूल गए
    उनकी कुर्बानी
    किसी अपनो ने ही
    आज़ाद हिन्द का मसाल था जलाया,,,,,

    यहाँ कभी था शोर शराबा
    खुब चली थी गोली
    हमें तो दे दी आजादी
    ख़ुद तो खेला खून की होली,,,,,,

    गुजरती हवाओं ने भी कहा
    यही हैं सुरवीरों की नगरी
    उन्होंने भी ऐसा फरमान किया
    जाते-जाते तिरंगे को सलाम किया,,,,,,

    सोई थी ये नगरी
    किसी एक ने जगाया था
    फिर आजादी का ये दीप
    सबों ने मिलकर जलाया था,,,,,,

    ~~~~मु.जुबेर हुसैन
    9709987920

    उत्तर देंहटाएं

यह खेल खत्म करों कश्तियाँ बदलने का (आदिवासी विमर्श सपने संघर्ष और वर्तमान समय)

“सियाह रात नहीं लेती नाम ढ़लने का यही वो वक्त है सूरज तेरे निकलने का कहीं न सबको संमदर बहाकर ले जाए ये खेल खत्म करो कश्तियाँ बदलने...