शब्दों का खेल


ये शब्द ही हैं जो सच्चा खेल खेलते हैं
कभी गम, कभी खुशियाँ देते हैं
आज के लोग शब्दों से बहुत खेलते हैं
कार्यालय में गए
तो कार्यकर्ता की देरी पे गालियाँ देते हैं
वही शब्द फिर सहायक की प्रशंसा करते हैं
दोपहर में फिर नम्रतापूर्ण निवेदन
मित्रों से खाने के लिए
वही शब्द चपरासी को
हड़काने के लिए
वही शब्द ‘फिर मिलेंगे’ कहने के लिए
वही शब्द ‘अलविदा’ कहने के लिए
शाम घर पहुंचे
भीगी बिल्ली सी आवाज में चाय की पुकार के लिए
वही शब्द पत्नी से बातें दो चार के लिए
वही शब्द फिर नींद में आवाज के लिए
सुबह हुई समाचार पत्र आया
फिर वही शब्द सरकार की प्रशंशा के लिए
कुछ देर बाद समाचार पत्र पढकर "क्या बकवास" है के लिए
ये शब्दों की खिलखिलाहट है
ये शब्दों का माजरा है
ये शब्दों की कहानी है
ये शब्दों का मुजरा है
शाम हुई बच्चों की याद आई
सोंच में शब्दों  में उनके भविष्य के विचार के लिए
शब्द  ही तो हैं जो करते हैं जो करते हैं
शब्दों  में पड़ोसन से आँखे दो चार
शब्दों में उनके कार्यों की प्रशंसा
शब्दों में ही पत्नी के काम चोर होने की निंदा
प्रेम का समय-नहीं फैशन के आगे
कहके बस शब्दों में पड़ोसन से पत्नी को बुरा बताके
शब्द  ही तो हैं कहाँ तक कहें
हुई लड़ाई पिता से तो शब्दों  में सम्मान भूल गए
हुई मिठास माँ से फिर सम्मान में झूल गए
गलती हुई छमा करना
यहाँ भी ये शब्द ही काम आते है
शाबास फिर से प्रगति करोगे
बात यही शब्द बनाते हैं
मित्र से मित्रता यही तो बनाते हैं
चाय के समय देर हुई
क्या महोदय जी "आप हमेशा लेट आते हैं"
दुकानदार से-
पत्नी को कुछ कुछ देना है
क्या दूँ
साहब बस ये बताएं क्या उम्र होगी
बस रसिया के शब्दों के जरिये
वो फिर आपको उल्लू बनाते हैं
"अरे ओ सांभा  कितने आदमी थे"
ये सुनके कुछ हंसी आती है
कहीं आदमी के भी आदमी होते हैं
पर क्या करें ये तो गब्बर के शब्द है जो हसीं लाते हैं
"अनेकता में एकता" चाचा नेहरु ने कहा था
ये उनके शब्द ही तो थे
जो आज वास्तिविकता की तरह
ह्रदय में प्रेमपूर्वक उतर जाते हैं
बुढापा आया-
बेटा जरा पानी दे देना
ये भी शब्द हैं जो एक पिता के हैं
और पुत्र का धर्म पानी देने का है
ये महा-"ऋषि" अपनी वाणी से बाताते है
-आया पिता जी पानी लेके मैं
-पास में रक्खा है खुद ही पी लो
दोनों बातें ये शब्द ही कहाते हैं
हम हँसते हैं, गाते हैं
हमारी ख़ुशी क्या है
यही शब्द तो व्यक्त कराते हैं
हमें वोट दीजिये हम नोट दते हैं
यही शब्द तो जनता के दिल में उतर जाते हैं
बस फिर क्या इधर से नोट लेना-उधर से भी
दोनों पक्षों को ये शब्द ही तो संतुस्ट कराते हैं
बस ये शब्द हैं की
करिश्मा दिखाते हैं
बात बनाते हैं
विजय दिलाते हैं-हिटलर के जैसी
भाई मान गए
सच में ये शब्दों का खेल है.


 ऋषि गुप्ता, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली 

विक्रांत कुमार की पांच कवितायेँ

  
1.
देवताओं की संस्कृति
और पतित देवता,
अंधेरे इतिहास के सियासत का हवाला देते हैं ।
कहते हैं-
“वो आवाज तब तलक जीवित रहेगी,
जब तलक कि दुनिया की छाती पर मैं बैठा रहूँ” ।

‘विषैले धतूरों की काँटेदार फसलें
और
देवलोक में मानव रक्त से सिंचित खेत’
सब धर्म का व्यापार है ।

जहाँ संसाधन,
सत्ता की रखैल बन गयी है
और धर्म,
देवलोक की अदालत में कानून बना रहा है ।

2.
उस रोज मैं,
दिवास्वप्न में रंगरलियाँ मना रहा था ।
वो खुरदरे टहनियों की छाल सी
झुलसी चमडियों के सहारे
धोती की फटी पोटली बांधे
हाथ में टीन का कटोरा लिए
भटक रही थी, फदर-फदर ।

मुह से झाग और बदबू,
फटे ब्लाउज से झाकता यौवन
शायद ! भूखमरी से सूख रहा था
अपनी अंतिम आस्था की यात्रा ताक में ।

मगर मैं भूल रहा था,
अपने दादा के बताये उन यादों को
कि कभी मैं भी भटकता था
चाँदनी रातों में,
अपनी चंचलता के साथ
टीन की गमली लिए
और चुनता था
जूठन ...।

3.
डगमगाते कदम ,
साथ छोडता आत्मविश्वास
कहीं ठहर तो नही गये हम ..
नियत स्थान पे ।
जहाँ अशांका के तौर पे ....भिनभिनाते संकट ..
जो रूक- रूक कर , मेरे सामने प्रश्न चिन्ह लगाते हुए,
बार- बार बढते कदम को जैसे खींच रहा हो ...
कह रहा हो , तुम्हारा प्रयास निर्रथक रहेगा...
क्योंकि तुम अपने बनाये रास्ते पे नही चल रहे हो..

4.
प्रियतमा की याद में,
आज इलाहाबाद
कल बनारस...
परसों दिल्ली
कहाँ -कहाँ नही गया ,
कहीं नही मिली ..।
अबकी बार खोजूंगा हूँ ,
अपने शहर में...
अपने गांव में ...
अपनी मिट्टी में ।

5.
खाली जुबान
बंद मुठ्ठी
धुंआ में तब्दील छुक-छुक विचारधारा
विस्फोट और बारूदी-गंध
गुरिल्ला -हमलावर
बिस्तर और बंदूक
प्रादेशिक -साहित्य
काली-पट्टी
लाल-झंडा
और चमड़-टोली का अड्डा
शायद ही किसी साहित्य को मिलता होगा ..
कोख पर भिन-भिनाती मक्खियों की भिन-भिनाहट
मुसहर-टोली से इन्कलाब की आहट ।



संपर्क : विक्रांत कुमार , हिंदी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर छत्तिसगढ  

चर्चा में

  
वे जो चर्चा में हैं,
उन्हें पूरा भरोसा है कि वे अपनी बदौलत चर्चा में हैं ।

वे जो चर्चा में नहीं हैं,
उन्हें पक्का विश्वास कि जान बूझ कर उन्हें
चर्चा के बहार किया गया है ।
‘वरना क्या बात कर नहीं आती’

समकालीनता की न्याय बुद्धि पर भरोसा है उन्हें
जो चर्चा में हैं ।
जो चर्चा में नहीं हैं उन्हें न्याय के लिए
आलोचना के नए उपकरणों की दरकार है ।

साहित्य की सामाजिकता का व्यवहारिक ज्ञान रखते हैं
जो चर्चा में हैं,
जो चर्चा में नहीं हैं,
मन ही मन अपने कमज़ोर जनसम्पर्क पर कुढ़ते हैं,
‘तेल’ एक परम प्रिय शब्द है उनका,
जिसे क्रिया-पद में हथियार और संज्ञा में कालिख की तरह
उछालते हैं वे चर्चितो की ओर ।

वे जो चर्चा में हैं
न बुरा देखते हैं न सुनते न बोलते
मिठबोलुआ ।
शराफ़त अदब का पर्याय है उनके लिए
जो चर्चा में नहीं हैं,
शराफत के धुप्पल से दूर मनबढ़ कुचर्चा में रस-रंजित रहते हैं ।

चर्चित होने के सूत्र
साहित्य के पालने में ही मिल गए थे उन चिकने पात होनहार चर्चितों को
वे जो चर्चा में नहीं हैं, उन्हें बुढ़ापे में पता चला कि वे
चर्चा में क्यों नहीं हैं ?

जो चर्चा में हैं, वे गलचौरा तो करते हैं
मगर आतिशी चर्चाओं में चुप ही रहते हैं
फेस बुकिया लाइक की तरह ।
जो चर्चा में नहीं हैं, वे बोलक्कड टिप्पड़ियां जड़ते
आ बैल मुझे मार की तरह, दुश्मनी नेवतते 
भाषा अक्सर जूतामार हो जाती है उनकी
अपने उपद्रवी मूल्य का इल्म है उन्हें ।

जो चर्चा में नहीं हैं
वे अक्सर आलोचना के सामंती संस्कारों
और साहित्य पर बाज़ार के प्रभावों की चर्चा करते हैं ।
गरिमा गुरूर और ग़ैरत की महीन परिभाषाओं में न्यस्त रहते हैं ।
चर्चा के जुगाड़ में अकिंचन व्यस्त रहते हैं ,
जीभ और तलवों की पक्की पहचान होती है उन्हें

वे जो चर्चा में हैं उन्हें ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ में सेतु बनाने आता है,
तानाशाह बाजऔकात तानाशाह नहीं होता उनके लिए
बाकी जो चर्चा में नहीं हैं
वे न ‘यहाँ’ के हैं न ‘वहाँ’ के ।

जो चर्चा में हैं उन्हें पता है,
कि चर्चा में रहने के लिए क्या-क्या नहीं करना चाहिए
जो चर्चा में नहीं हैं उन्हें भी पता है कि
चर्चा में होने के लिए क्या-क्या करना चाहिए ।
साहित्य की भौतिकता के वाम-पुजारी चर्चा में हैं
जो चर्चा में नहीं हैं उन्हें साहित्य का आध्यात्म आकर्षित करता है ।

समकालीनता का गहरा सम्मान है उनके मन में
वे ज़न्नत की हकीकत से दूर रहते हैं,
तभी चर्चा में हैं ।

जो चर्चा में नहीं हैं वे समय के सतहीपन पर
जुगनुओं की तरह आक्रामक हैं,
आने वाले कल पर भरोसा है उन्हें
दुखी की आत्मा की पुकार की तरह ।
समय का सूप साहित्य को फटक-पछोरकर सार-सार गह लेगा
एक दिन,
उस दिन वे हों न हों पर चर्चा में अवश्य होंगे । .

देवेन्द्र आर्य,
A -127 आवास विकास कालोनी, शाहपुर
गोरखपुर -273006 , मोबाइल - 09794840990


सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के नाम एक खुला पत्र


आप सभी छोटे-बड़े सरकारी डाक्टर साहबों को मेरा नमस्कार..!

            उम्मीद करता हूँ आप लोग पूरी तरह से भौतिक सुख सुविधा का लाभ उठाते हुए अमन-चैन की जिन्दगी जी रहे होंगे. अगर नहीं जी पा रहे हों; तो, मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपके मरीज कंजूस होते जा रहे हैं. वैसे तो आम तौर पर मरीज कंजूस होते ही हैं. लेकिन आप लोग भी कम मझे हुए खिलाड़ी नहीं हो. मरीज चाहें जितना भी अपनी कंजूसी के लिए अपना तर्क गढ़ लें आप लोग उनकी गुदड़ी के लाल को निकलवा कर ही दम लेते हो. यदि आपके पास इस तरह का कौशल नहीं है तो आपके लिए मेरा कहना है कि आप डाक्टर नहीं हो सकते. ओह ! माफ़ी चाहूँगा आप लोगों को तो यहाँ भारत में धरती के भगवान का दर्जा दिया जाता है. तो मेरा कहना यही है कि आप भगवान नहीं हो बल्कि इन्सान हो. यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि, यह पत्र उन इंसानों के लिए तो बिलकुल भी नहीं लिख रहा हूँ. जिनमें यह कौशल नहीं है.     
खैर ! जबतक कि यह पत्र आप लोगों के पास पहुंचे और आप चौंधियाई हुई आखों से पढ़कर झट से बोल पड़ें कि “हू आर यू ?” तो डाक्टर साहब आप लोग यह वाक्य बोलें, उससे पहले ही मैं बता देना चाहता हूँ कि “मैं कौन हूँ.” दरअसल मैं आपकी ही क्लिनिक का एक मरीज हूँ. भरोसा नहीं हो रहा न ? भरोसा होगा भी नहीं, आप लोग तो हमारा टेस्ट दर टेस्ट कराने में इतने मशगुल हो कि मुझे पहचान भी नहीं सकते. हमारी पहचान तो आपके लिए बस इतनी सी है कि मैं आपका एक ‘मॉडल-ओर्गनिज्म’ हूँ. फिर भी मैं आप लोगों से अपने बारे में बता देना चाहता हूँ. तो आप मेरी पहचान के लिए सबसे पहले तो अपने क्लिनिक के ए.सी. वाले कमरे से निकलिए और अपने ही किसी वार्ड में आइये. मैं आपको पहले ही बेड पर मिल जाऊंगा. वैसे तो प्रत्येक बेड पर मैं ही हूँ, लेकिन आपसे इतनी मेहनत करवाना नहीं चाहता. आपकी आखें शायद मुझे देख ही न पाए और देखें भी तो शायद पहचान न पाए. इसलिए पहले ही बेड पर आप फोकस करें तो हम दोनों के लिए अच्छा होगा.
तो डाक्टर साहब जब आप मुझे देख चुके होंगे, पहचान चुके होंगे, तब आप शायद यह बोल पड़ें कि-“व्हाट यू वांट ?” आपके जबड़ों को तकलीफ पहुंचे उससे पहले ही मै आपको यह बता देना चाहता हूँ कि ‘मैं क्या चाहता हूँ ?’ दरअसल मुझे कुछ नहीं चाहिए. बस कुछ बातें हैं; जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ. हालांकि मैं यह जानता हूँ आप लोग इसकी इजाजत नहीं देंगे और जल्द ही मुझे किसी और टेस्ट के लिए किसी नए टेस्टिंग मशीन के पास भेज देंगे. इसलिए आप इतना सब करें उससे पहले ही मैं यह खुला पत्र आप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ. और इसी के माध्यम से अपनी बात कह रहा हूँ.
यह बात तो आप जानते ही होंगे कि मैं आप के पास जिला सरकारी अस्पताल में दिखाने के लिए आया था. जहाँ एक रूपये की पर्ची लगी थी. उसी पर्ची पर लिखे नाम से आपने मुझे पुकारा था. मेरी नब्ज टटोली और मुझसे थोड़ी बहुत पूछ-ताछ करके फटाफट कुछ दवाओं का नाम लिख दिया था. मुझे अच्छी तरह याद है जब मैं वहां से निकलने लगा था तो आपने मुझसे यही कहा कि- “कुछ दवाएं काउंटर पर से ले लेना और बाकी पर्ची पर लिखी दवा की दूकान से...और हाँ आपने यह भी कहा था कि ठीक होना चाहते हो तो सुबह-शाम मैं अपने क्लिनिक पर देखता हूँ वहां आ जाना.” आपने अपने क्लिनिक का नामपता लिखा हुआ एक कार्ड मुझे थमा दिया था.
डाक्टर साहब मैं सच में ठीक होना चाहता था, इसीलिए तो दूसरे ही दिन आपके क्लिनिक पहुँच गया. चार सौ रूपये की पर्ची कटवाई और घंटो बैठा इन्तजार करता रहा. हालांकि, वहां सिर्फ मैं ही नहीं था, करीब-करीब पचास लोग होंगे. खांसते, कराहते, रोते-विलखते लोग. वे सभी आपका इन्तजार कर रहे थे.
मुझे याद है, आप उस दिन सरकारी अस्पताल से जल्दी नहीं आ पाए थे. जैसा कि आम तौर पर आप रोज दिन के दो या तीन बजे तक आ जाते थे. मैं आपकी मज़बूरी समझ सकता हूँ, कहीं कोई मीटिंग में फस गए होंगे या गप्पे मारने में उलझ गए होंगे. यह आपके लिए कोई नयी बात नहीं है. आप अच्छी तरह जानते हैं कि आपके मरीज आपसे वेवफाई नहीं कर सकते, वे मरते दम तक आपका इन्तजार करते रहेंगे. इसलिए आपकी देरी के लिए मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ.
खैर ! छोड़िये इन सब बातों को यहाँ पर इन सब बातों का कोई औचित्य नहीं. मैं अपने मुद्दे पर आता हूँ और अपनी बात शुरू करता हूँ. तो डाक्टर साहब, उस दिन आप पांच बजे तक आये. यही कोई पाजेरो टाईप की लग्जरी गाड़ी से. आपके आते ही हम सब मरीज, सम्मान में खड़े हुए और जो खड़े नहीं हो सकते थे उनकी जान में जान आयी. हालांकि आपने हम लोगों की तरफ थोड़ा भी ध्यान नहीं दिया. सरसराते हुए अपने केबिन में चले गए, नक्कासीदार सीसे से घिरा वातानुकूलित कमरा, और आरामदायक कुर्सी जिसपर आप बैठे.
बाहर हम सबकी पर्ची नंबर से लगी हुई थी. आप अपने केबिन में आराम से बैठे हुए कुछ हिसाब-किताब कर रहे थे. शायद यह देख रहे होंगे कि आज सिर्फ पचास ही मरीज क्यों ? फिर थोड़ी ही देर में आपने अपने केविन से बेल बजाया तो पहले नंबर वाला मरीज अन्दर गया. उसदिन मुझे पता चला कि आप डाक्टरी में कितने महारथी हैं. सिर्फ दो मिनट में ही उसकी छुट्टी कर दी थी आपने. और लगे हाथ उसे एक पता लिखा कार्ड भी दिया था जिसे लेकर वह उस बताये पते पर एक्सरे कराने चला गया. दूसरे, तीसरे, चौथे से लेकर अट्ठारहवें नंबर तक मैंने बड़े ही गौर से देखा कि आपने किसी का भी दो मिनट से ज्यादा समय नहीं लिया. और जब वे आपके केविन से लौटे तो उन सबके हाथ में एक-एक पता लिखा कार्ड था. कोई ब्लड टेस्ट के लिए गया, कोई एक्सरे के लिए तो कोई सिटी स्कैन के लिए.
मुझे यह पक्का भरोसा हो गया था कि आपने अपने किसी परिचित के पास ही उन लोगों को भेजा था. कितना ख्याल रखते हैं न आप अपने मरीजों का. कहीं ऐरे-गैरे के पास अपने मरीजों को कैसे भेज सकते हैं भला ?. कोई भी सरकारी डाक्टर अपने प्राइवेट मरीजों को किसी ऐरे-गैरे के पास नहीं भेज सकता.
दूसरे का तो मैं पूरा वाकिया नहीं बता सकता लेकिन हम सब मरीजों की हालत लगभग एक जैसी ही है इसलिए सभी मरीजों की संवेदनाओं का एहसाह करते हुए मैं अपने आपको उनका प्रतिनिधि समझ रहा हूँ. बहरहाल, जब मेरा उन्नीसवां नंबर आया तो आपके बेल बजाते ही मैं आपके केविन में गया. मुझे याद है, जाते ही मैंने अपना शिष्टाचार निभाते हुए आपको अपना नमस्कार दागा था. जिसपर आपने कोई ध्यान नहीं दिया था. और बड़े ही प्रोफेशनल ढंग से मुझसे पूछा कि “बोलो क्या परेशानी है ?” मैंने बताया कि-“खांसी हुई है ...कई जगह दिखाया पर ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही है.”  इसपर आपने मुझे एक इनहेलर दिया, जिसका मुझे देने से पहले मुझसे सौ रूपये आपने जमा करा लिया. फिर बोले कि-“दम लगाकर खींचो” मैंने भी दम लगाया और खींच लिया. गले में कुछ ठण्डा-ठण्डा सा लगा. फिर आपने वह इनहेलर मुझसे ले लिया और मुझे भी एक कार्ड थमाते हुए बोले कि-“इस पते पर जाओ और अपने बलगम की जाँच कराओ.” मैंने पूछा था-“कितना खर्च लगेगा ?” तो आपने बताया कि-“यही कोई पांच सात सौ रूपये लगेंगे.”
मैं चिंता में पड़ गया था कि घर से तो बस एक हजार लेकर आया था, चार सौ लग गए फीस के, सौ इनहेलर के और पांच सौ बलगम चेक कराने के, अगर यह चेककराई कहीं सात सौ की हुई तो उसमे ही दो सौ कम पड़ेंगे. फिर दवा कैसे लूँगा ?
अभी मैं सोच ही रहा था कि आपने कड़क आवाज में बोला-“चलो अब जाओ...जांच कराने के बाद, यह एक सप्ताह की दवा लिख दिया हूँ  काउंटर से ले लेना.”
“डाक्टर साहब दवा कितने की पड़ेगी ?” मेरा वाक्य पूरा ही हुआ था कि आप ऐसे बोल पड़े जैसे आप जान रहे थे कि मैं यही पूछने वाला हूँ.-“जाओ, काउंटर पर पूछ लेना...वैसे यह दवा पंद्रह सौ से नीचे की ही होगी.”
“डाक्टर साहब मैं ठीक तो हो जाऊँगा न”-शायद आपने इस प्रश्न की उम्मीद न की होगी इसलिए आपने जल्दीबाजी कहा था-“अगले सप्ताह जांच कराकर आओगे, तब बताऊंगा कि ठीक होगे की नहीं.”
इससे आगे न तो मुझे कुछ आपसे पूछने की हिम्मत हुई और न ही कुछ कहने की. इस तरह उस दिन मैं जैसे-तैसे करके अपने बलगम की जांच कराई और दवा लिया. आपके बताये अनुशार एक सप्ताह तक नियमित दवा लेते रहा. हालांकि इसका मेरी खांसी पर कोई असर नहीं हुआ. और रात-दिन उसी तरह खांसते रहा जिसतरह आपसे मिलने के पहले खांसता था.
अगले हप्ते जब मैं आपके क्लिनिक गया तो आपकी कुशलता पर मुझे पक्का यकीन हो गया क्योंकि उस दिन भी आपने किसी का दो मिनट से ज्यादा का समय नहीं लिया. मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि समय का मनेजमेंट कोई आपसे सीखे. जहाँ तक मेरी बात है तो उसदिन जबकि मेरे बलगम की रोपोर्ट आ गयी थी. आपने उसे देखा और कहा कि-“तुम्हे तो कोई परेशानी नहीं है एक काम करो एक जांच और करा लो तब मैं देखकर बताऊंगा कि क्या करना है...तबतक यह एक सप्ताह दवा और दे देता हूँ... काउंटर से ले लेना.” इस बार मैं पूरी तरह मैं समझ गया था कि मुझे क्या करना है. इसलिए आगे आपसे कोई सवाल नहीं किया.
तो डाक्टर साहब मैं आपको बताते चलूं कि आप लगभग दस सप्ताह तक मेरा इलाज करते रहे, जांच के लिए भेजते रहे, अगले सप्ताह की दवा देते रहे. मैं जांच कराते रहा, नियमित दावा लेते रहा और खांसी जस की तस बनी रही. मैं अपने अनुभव से बता सकता हूँ कि मेरी खांसी पहले सूखी-सूखी सी आती थी. लेकिन जबसे आपकी दवा ले रहा हूँ उसमे कुछ गीलापन आ गया है. बस बलगम बाहर नहीं निकालता, गले में ही चटर-पटर किये रहता है.
आगे बात ग्यारहवें हप्ते की है. जब आपके पास कोई और जांच नहीं बचा तब आपने मुझे बड़े ही प्यार से समझाते हुए कहा था कि-“अस्पताल में एडमिट करना पड़ेगा. तब जाकर तुम्हारी खांसी ठीक हो पाएगी.” डाक्टर साहब क्या बताऊँ आपसे, आपकी यह बात सुनकर मैं बड़ा ही पेशोपेस में पड़ गया था. मेरे सामने अब कोई रास्ता नहीं बचा था. दो महीने से मैं कहीं भी काम करने नहीं जा पाया था. सोचा था कि कर्जा लेकर पहले इलाज करवा लेता हूँ फिर जब मैं ठीक हो जाऊँगा तो सबके कर्जे उतार दूंगा. लेकिन अब मैं क्या करूँ ? अब मैं किससे उधार मांगू ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. अंत में मैंने यह निर्णय लिया कि पत्नी के गहने बेच देता हूँ और अस्पताल में एडमिट हो जाता हूँ. जी है तो जहान है...गहने फिर बन जायेंगे. आखिर जब डाक्टर साहब कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे. मैं इस इलाज को किसी भी कीमत में नहीं छोड़ सकता.
इस तरह डक्टर साहब मैंने आपकी बात मान ली और आपके अस्पताल में एडमिट हो गया पत्नी के गहने बेचकर. मुझे यहाँ आपकी क्लिनिक में भर्ती हुए कोई दस दिन हुए होंगे. जिस वार्ड में मुझे आपलोगों रखा था. वही मेरे बगल में एक युवक और था. अ..अ...हाँ मुझे याद आ गया उसका नाम सुबोध था. जिसको मरे हुए दो दिन हो चुके थे फिर भी आप उसका इलाज करते रहे. तरह-तरह के जाँच का कागज उसके परिवार वालों को थमाते रहे. और उनसे उन जाचों की कीमत लेते रहे.
आखिरकार जब आपको लगा कि अब इससे ज्यादा कमाई नहीं किया जा सकता तब आपने सुबोध के परिवार वालों को बड़ी ही सहानुभूति के साथ कहा कि-“माफ़ करिए हमने अपनी तरफ से भरपूर कोशिश किया, लेकिन हम उसे बचाने असफल रहे.” रोते-बिलखते, सुबोध के परिवार वालों को मैंने देखा. मैंने देखा उसकी माँ को देखा, किस तरह पछाड़े खा-खाकर गिर रही थी...रो-रो के बुरा हाल था उस बेचारी माँ का... और आपलोग कागजों को दुरुस्त करने में मशगुल रहे.
उस दिन से डाक्टर साहब मैं आप से डरने लगा था. खासकर उस दिन से और जब आपने मुझसे कहा था कि मेरे फेफड़े का आपरेशन करना पड़ेगा. मेरे सामने सुबोध का चेहरा बार-बार आ जा रहा है. वह चेहरा जब वह मुस्कुराते हुए मुझसे बोला था कि “डाक्टर साहब कह रहे थे कि जल्द ही मैं ठीक हो जाऊँगा...भईया ! जब मैं ठीक होकर घर चला जाऊंगा. तो आपकी मुझे बहुत याद आएगी. आप चिंता मत करियेगा...आप भी जल्दी ही ठीक हो जायेंगे...तब मैं आपके घर आऊंगा. आप मेरी भाभी मुझे मिलवायेंगे न ? मैंने उसकी हाँ में हाँ मिलाते मुस्कुरा भर दिया था. ठीक यही चेहरा डाक्टर साहब...यही चेहरा “आप मेरी भाभी से मुझे मिलवायेंगे न ?” वह बार-बार मुझसे पूछने आ जाता है. जानते है डाक्टर साहब मैं अब उसकी हाँ में हाँ नहीं मिला पाता और ना ही मुस्कुरा पाता हूँ. मुझे बहुत रोना आता है...कभी-कभी तो रो भी लेता हूँ. क्या करू ? अब आपके टेस्टों और जाचों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रही. सच बताऊँ तो अब मैं ठीक होना ही नहीं चाहता. मेरी खांसी से अब मुझे दिल्लगी हो गयी है.     
अत: डाक्टर साहब मेरी आपसे विनती है कि मुझे यहाँ से जाने दें. मैं नहीं चाहता कि मेरा भी हाल सुबोध जैसा हो, और उसकी माँ की तरह मेरी पत्नी भी पछाड़ें खा-खाकर गिरे. मुझे आपसे कोई शिकवा-शिकायत नही. बस आप यहाँ से मुझे जाने दे आपका सदा आभारी रहूँगा.

आपका एक प्रिय मरीज   


महेश सिंह, शोधार्थी, हिंदी विभाग, पांडिचेरी यूनिवर्सिटी पांडिचेरी 605014                            

नरेश मेहता के प्रबंध काव्यों में मानवीय संवेदना: आधुनिक सन्दर्भ


                                                                                                          
आधुनिक प्रबंध काव्यों के रचनात्मक आयाम उनके कवियों की सार्थक रचनाधर्मिता के ही प्रमाण है । इन प्रबंध काव्यों का प्रमुख सरोकार युगीन चेतना व मानवीय संवेदना की सशक्त अभिव्यक्ति है । मानवीय व्यक्तित्व, मानवीय प्रकृति व मानवीय सत्ता के संघर्ष व जिजीविषा के मूल्यांकन को प्रबंध काव्यकारों ने विविध रूपों में व्यक्त किया है । पारम्परिक कथाबंधों का नयी अर्थवत्ता के साथ ग्रहण इन आधुनिक प्रबंध काव्यों का महत्वपूर्ण आयाम है । ‘‘इसके अन्तर्गत अतीत के क्रम में वर्तमान को स्थापित करते हुए, परम्परा के परिप्रेक्ष्य में समकालिकता का मूल्यांकन कर जीवनगत महत्वपूर्ण तथ्य एवं निष्कर्ष प्ररूतुत किये है ।’’[1]
            संवेदना ही वह तत्व है जो कि कवि को काव्य रचना हेतु अग्रसर करती है । संवेदन जितना तीव्र होगा, उतना ही उसका तेज असर होगा और उसकी अभिव्यक्ति भी उसकी शक्ति व क्षमता के साथ हो सकेगी ।’’[2] अतः साहित्यकार एक संवेदनशील सृजक है । वह मानवीय अनुभूति को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता हैं । नरेश मेहता जी का प्रबंध काव्य इसका प्रमाण है । आधुनिक कवि श्रीनरेश मेहता ने प्रबंध काव्यों में मानव के उन चिंरतन भावों की अभिव्यक्ति की है, जो युग परिवर्तन के साथ अपना स्वरूप व संदर्भ तो बदलते जा रहे है, लेकिन इनकी महता व प्रकृति आज भी शाश्वत उपस्थिति का संकेत करती है । नरेश मेहता के प्रबंध काव्य ‘संशय की एक रात’, ‘प्रवाद पर्व’ रामकथा आधारित तथा ‘महाप्रस्थान’ महाभारतीय कथा आधारित है । इन काव्यों का प्रमुख प्रतिपाद्य मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति है । इनका काव्य पाठक को संवेदना से जोड़कर सत्य की अनुभूति कराता है । मेहता जी की रचनाएं पाठक के संवेदन को गहराई और विस्तार प्रदान करती है ।
            परम्परागत प्रबंध काव्यों की बाह्यता व स्थूलता को त्यागकर नरेश मेहता ने आधुनिेक चेतना के सूक्ष्म व संश्लिष्ट रूप को ही रचनाओं का आधार बनाया है । सम्पूर्ण कथा के स्थान पर किसी प्रसंग, घटना अथवा संदर्भ विशेष को लेकर ही प्रबंध रचनाएँ अधिक हो रही है । वैचारिक स्थापनाएँ, मनोगत भावों का अन्तर्द्वन्द, आधुनिक भाव दशाएँ आदि की प्रस्तुति ज्यों-ज्यों बढ़ती जा रही है, प्रबंधों की कथागत स्थिति भी स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर बढ़ रही है ।’’[3] आधुनिक मानव की संवेदनाओं की अभिव्यंजना हेतु कवि नये प्रयोग करता है । युग जीवन के यथार्थ को चित्रित व अभिव्यक्त करना आधुनिक प्रबंध काव्यों का मूल उद्देश्य है ।
            नरेश मेहता के प्रबंध काव्य ‘संशय की एक रात’ की रात में न तो ऐतिहासिक राम है और न भविष्य प्रणेता कहे जा सकते है । वे आज के कवि के लिए आधुनिक व्यक्ति की संशयात्मक मानसिकता व संकल्प-विकल्प की द्वन्द्वात्मक स्थिति को अभिव्यक्त करने का माध्यम है । राम के माध्यम से नरेश मेहता ने मानवीय संवेदन को स्पष्ट किया है । लक्ष्मीकान्त वर्मा इस सन्दर्भ में लिखते हैं- ‘‘आधुनिक विसंगतियों का राम में आरोपण तथा उनके माध्यम से अपने युगों की समस्याओं के समाधान के रूप में विपरीत मूल्यों, बोधों ओैर मान्यताओं के बीच एक सही दृष्टि अपनाने की प्रेरणा ही मूल अभीष्ट है ।’’[4] राम जब सीता की मुक्ति चाहते है युद्ध से पूर्व युद्ध जन्य विध्वंस के बारे में पूर्व विचार कर चिंतामग्न है । उस समय स्थिति का चित्रण इस काव्य में हुआ है । विभिन्न समस्याओं की अन्तर्द्वन्दता से जुझता राम स्वयं को सामूहिक निर्णय को सौपने पर भी पूर्ण आश्वस्त नही हो पाता । यही मानवीय संवेदना और वैयक्तिक विसंगति यहां स्पष्ट है जो आधुनिक मानव की भी विसंगति है-
‘‘दो सत्य/दो संकल्प/दो-दो आस्थाएँ/व्यक्ति में ही अप्रमाणित व्यक्ति पैदा हो रहा है ।’’[5]
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‘‘यदि मै मात्र कर्म हूँ/तो यह कर्म का संशय है/ यदि मैं मात्र क्षण हूँ तो यह क्षण का संशय है/
यदि मैं मात्र घटना हूँ / तो यह घटना का संशय है ।’’[6]
अतः स्पष्ट है कि मानव की नियति संशयात्मक है । इस काव्य में मन की इस संशयात्मक संवेदना को अभिव्यक्ति मिली है । जो आाधुनिक मानव की मानसिक स्थिति, मनोव्यथा, आत्मसंशय की अभिव्यक्ति है । ‘‘मानस संवेदना और अनुभूति के आधार पर मूल्यों का अन्वेषण करता है । इस कृति के माध्यम से नरेश मेहता ने राम को एक प्रज्ञा प्रतीक के रूप में आधुनिक मानव का प्रतिनिधि बनाकर युगीन संशय वैषम्य और विंसगतियों के द्वारा युगानुरूप नयी धारणाए और नए मूल्य खोजने की चेष्टा की है आधुनिकता संस्कृति का एक नया दौर है । इस दौर में राम का मिथक अलग-अलग संवेदनात्मक और विचारात्मक संदर्भों से जुड़कर अभिव्यक्त हुआ है, नरेश मेहता ने ‘संशय की एक रात’ में प्रस्तुत किया है । ‘संशय की एक रात’ मूल्यों और मान्यताओं के उहापोह को प्रस्तुत करने वाला काव्य है । परस्पर संघर्ष, विपरीत मूल्यों और मान्यताओं को समकालीन मूल्यों की कसौटी पर कसते हुए एक फेर-बदल किया है ।’’[7]
            नरेश मेहता का ‘महाप्रस्थान’ प्रबंध काव्य महाभारत के युद्धोपरांत पाँडवों द्वारा द्रौपदी सहित स्वर्गारोहण हेतु प्रस्थान के प्रसंग पर आधारित है । इस प्रबंध काव्य में मेहता जी ने मानवीय संवेदनाओं को महाभारतीय समाज और युद्ध की पृष्ठभूमि में चित्रित किया है । ‘‘प्रत्येक मनुष्य के भीतर आरत्रिक रामायण सम्पन्न होती है तो आक्षण अपनक परिवेश में वह महाभारत का साक्षात करता है । अपनी प्रकृति, संस्कार, गुण, धर्म तथा स्वत्व के अनुरूप् हर इन कथा गाथाओं में हम अपना पक्ष निर्धारित करते है ।’’[8] राजव्यवस्था, युद्ध जनित परिस्थितियां व उसके कारण, राज्य की गरिमा के समक्ष मानव का अस्तित्व, जीवन मूल्य आदि भी काव्य में अभिव्यक्त हुए है । ‘‘युधिष्ठिर के महाप्रस्थापिक आख्यानक के माध्यम से कवि ने जिन संदर्भों को उठाया है उसमें चाहे अन्धे धृतराष्ट्र की कुटिलता हो या भीष्म और द्रोण जैसे आचार्यों का असत्य का पक्षधर होना हो या दुर्योधन का कुटिल दंभ अठारह दिन का महायुद्ध जिसमें विजयी और पराजित सभी अकिंचन से हो गए । आज के संदर्भ में उतना ही प्रांसगिक है ।’’[9] आधुनिक सन्दर्भ में ‘महाप्रस्थान’ जिस कथ्य को चित्रित करता है वह विशिष्ट होते हुए भी साधारण मानव की संवेदनाओं की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति ही कही जा सकती है । उदाहरणार्थ-
‘‘किसी भी साम्राज्य ये बड़ा है/ एक बंधु/ एक अनाम मनुष्य! /मुझे मनुष्य में विराजे देवता में/ सदा विश्वास रहा है ।’’[10]
‘‘सारे मानवीय दुःखों का आधार/ यह राज्य है/ राज्य व्यवस्था है और राज्य व्यवस्था का दर्शन है ।’’[11]
राज्य के नहीं धर्म के नियमों पर समाज आधारित है/ राज्य पर अंकुश बने रहने के लिए/ धर्म और विचार को/ स्वतंत्र रहने दो पार्थ!’’[12]
मेहता जी ने महाप्रस्थान में व्यक्ति की आन्तरिक भावाभिव्यक्ति, सुख-दुःख, धर्म, व्यवस्था, नियम, समाज आदि को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया है । मानव मन की उद्गार, संवेदना को सहजता से अभिव्यक्त किया है । ‘‘राज्य व्यवस्था की अमानवीय क्रूरता निरंकुशता युद्धों की विनाशकारी भयावहता और व्यक्ति की महत्ता पर कवि ने सम्यक प्रकाश डाला है । इस पर्व में मूल महाभारत और व्यक्ति की महत्ता पर कवि ने सम्यक प्रकाश डाला है ।’’[13] इस कृति के चिन्तन का मूल केन्द्र बिन्दु युधिष्ठिर है जिसके द्वारा कवि ने तत्कालीन संवेदना और स्थिति को स्पष्ट किया है साथ ही समकालीन बोध भी प्रस्तुत किया है इस प्रकार युधिष्ठिर मूल्यान्वेषी व्यक्ति है ।
            ‘प्रवाद पर्व’ नरेश मेहता का तीसरा प्रबंध काव्य है । इस काव्य मे कवि ने व्यक्ति की अभिव्यक्तिजन्य स्वतंत्रता के मूल अधिकार के संरक्षण हेतु राज्य एवं व्यक्ति संबंधों को प्रस्तुत किया है । रामायण के सीता निर्वासन के प्रसंग का कारण एक धोबी का प्रवाद था । आधुनिकता के सन्दर्भ में कवि ने व्यक्ति की इयत्ता, मानवीय गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व उसके मूल्य आदि के रूप् में अनेक समसामयिक संदर्भों को कृति का कथ्य बनाया है । वर्तमान मानव की संवेदनात्मक समस्याओं की अभिव्यक्ति कवि ने इस प्रबंध काव्य में की है । मानव आपातकालीन स्थितियों, दबावों, तनावों और नियंत्रणों में अक्षुण्ण रह सके, इस हेतु प्रवाद पर्व का सर्जन हुआ । उदाहरणार्थ-
‘‘जब भी/ ऐसी तर्जनी उठती है/ तब/ राजतंत्र और इतिहास कोलाहल से भर उठते है/ क्योंकि/ वह मात्र अंगुली नहीं होती राम! उसका एक प्रतिऐतिहासिक व्यक्तित्व होता है/ महत्व भी ।’’[14]
‘‘मनवीय स्वातंत्र्य/ मानवीय भाषा और/ मानवीय अभिव्यक्ति के प्रतिइतिहास का सामना/ वैसी ही / मानवीय प्रतिगरिमा के साथ करना होगा लक्ष्मण!’’[15]
‘‘राज्य और न्याय को / प्रतिष्ठापित होने दो भरत! यदि ये तत्वदर्शी नहीं होते तो एक दिन/ निश्चय ही ये भय के प्रतीक बन जायेंगें ।’’[16]
नरेश मेहता के आधुनिक राम ने मानव की प्रत्येक अभिव्यक्ति को महत्व प्रदान किया है । मानव के राज्य के प्रति भय का निष्कासन कर निर्भय बनाया है । जो अपनी संवेदनाओं को राजा के समक्ष प्रकट कर सके तथा राज्य उसके कथनों को, अभिव्यक्ति को सम्मान प्रदान करे । इस हेतु श्री राम को अपने दाम्पत्य संबंधों की बलि भी देनी पड़ी है । केवल एक साधारण मानव के स्वतंत्र कथन को सम्मान अर्थात प्रजा के अभिव्यक्ति के सम्मान हेतु । नरेश जी ने इन प्रसंगों मे महामानव को साधारण मानव की संवेदना का संस्पर्शी घोषित किया है ।
            निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि युग जीवन के यथार्थ एवं मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति आधुनिक प्रबंध काव्यों का प्रमुख उद्देश्य है । आधुनिकता ने सर्वप्रथम युग व युग की आवश्यकता व मांग को आंकलित किया है । वर्तमान प्रबंध काव्य रचनाओं का स्वरूप जितना सूक्ष्म व लघु हुआ है उतना ही विस्तृत विशद व गहन अभिव्यक्ति ये काव्य कर रहे है । नरेश मेहता ने प्रबंध काव्यों में युगीन संवेदना, संघर्षशील मानवास्था, मूल्यगत संक्रमण, युगीन यथार्थ व नवनिर्मित मूल्यबोध आदि संदभों में चित्रित किया है । मानवीय संवेदन की इस परिचर्चा में मानवीय नियति को किसी संकुचित भाग्यवादी दृष्टि से नहीं अपितु व्यापक आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा गया है ।


[1] डॉ. उर्वशी शर्मा, नव्य प्रबंध काव्यों में आधुनिक बोध, प्र.स. 15, बोहरा प्रकाशन, जयपुर, 1997
[2]डॉ. नवीन चन्द्र लोहनी, अज्ञेय की काव्य चेतना के आयाम, पृष्ठ  सं. 91, राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 1996
[3] डॉ. उर्वशी शर्मा, नव्य प्रबंध काव्यों में आधुनिक बोध, प्र.स. 9, बोहरा प्रकाशन, जयपुर, 1997
[4]लक्ष्मीकांत वर्मा, नयी कविता के प्रतिमान, पृष्ठ  सं. 259
[5]नरेश मेहता, संशय की एक रात, प्र.सं. 22-23
[6]वही,  पृष्ठ  सं. 51
[7]अनीता कुमारी, कविता में नरेश मेहताः एक अनुशीलन, पृष्ठ  स. 75, लोकवाणी संस्थान, दिल्ली, 1997
[8]नरेश मेहता, समीधा भाग-2, भूमिकाएं, पृ.सं.537, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994
[9]अनीता कुमारी, कविता में नरेश मेहताः एक अनुशीलन, पृ.स. 83, लोकवाणी संस्थान, दिल्ली, 1997
[10]नरेश मेहता, महाप्रस्थान, पृष्ठ  सं. 98
[11]अनीता कुमारी, कविता में नरेश मेहताः एक अनुशीलन, पृ.स. 86, लोकवाणी संस्थान, दिल्ली, 1997
[12] वही , पृष्ठ  सं. 110
[13] वही , पृष्ठ  सं. 110
[14]नरेश मेहता, प्रवाद पर्व, प्र.सं. 13
[15] वही ‘‘      ‘‘ पृष्ठ  सं. 38
[16]वही ‘‘      ‘‘ पृष्ठ  सं. 30



रेखा सैनी, शोधार्थी हिन्दी विभाग, वनस्थली विद्या पीठ (राजस्थान)


यह खेल खत्म करों कश्तियाँ बदलने का (आदिवासी विमर्श सपने संघर्ष और वर्तमान समय)

“सियाह रात नहीं लेती नाम ढ़लने का यही वो वक्त है सूरज तेरे निकलने का कहीं न सबको संमदर बहाकर ले जाए ये खेल खत्म करो कश्तियाँ बदलने...